मध्य प्रदेश की भूगर्भिक संरचना | Geological Structure of Madhya Pradesh)

मध्य प्रदेश की भूगर्भिक संरचना

किसी भी स्थान की भू-आकृति, उसकी भूगर्भिक संरचना, उसके निर्माण की प्रक्रिया एवं विकास की विभिन्न अवस्थाओं का परिणाम होती है।
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भूगर्भिक संरचना के अध्ययन से ही किसी स्थान विशेष पर पायी जाने वाली चट्टानों की संरचना (Structure of Rocks) और संघटन (Composition) की जानकारी मिलती है, जिसके आधार पर मिट्टी की विशेषताओं और खनिजों की उपलब्धता का निर्धारण होता है।

आज से लगभग 30 करोड़ वर्ष पहले विश्व के सभी महाद्वीप एकल भू-भाग (Single Land Mass) के रूप में जुड़े हुए थे, जिसे पैंजिया (Pangaea) अथवा वृहत महाद्वीप (Super Continent) कहा गया। इसके चारों ओर समुद्र था, जिसे पैंथालासा (Panthalassa) कहा गया है। इसका पैलियोजोइक तथा मेसोजोइक महाकल्प में विभाजन हो गया, जिसका उत्तरी भाग अंगारा लैण्ड (Angara Land) तथा दक्षिणी भाग गोण्डवाना लैण्ड (Gondwana Land) के नाम से जाना जाता है।

गोण्डवाना लैण्ड का उत्तर व उत्तर-पूर्व की ओर अभिसरण (Convergence) हुआ, जो वर्तमान में दक्षिण भारत के प्रायद्वीपीय भाग के रूप में विस्तृत है। इसके उत्तरी भाग में मध्य प्रदेश राज्य स्थित है।

भूगर्भिक हलचलों के कारण इस विशाल भू-भाग में कगार पर्वत, पठार आदि विभिन्न स्थलाकृतियों (Topographies) का निर्माण हुआ जिसके अपरदन (Erosion) और अपक्षय (Weathering) से चट्टानों एवं वनस्पतियों का अवसादों के रूप में निक्षेपण हुआ। इन अवसादों के रूपांतरण के फलस्वरूप मध्य कार्बोनीफेरस काल के बाद कोयले का निक्षेपण हुआ तथा अंतिम रूप से प्लीस्टोसीन काल तथा होलोसीन काल में मैदानी भागों का निर्माण हुआ।


क्रिटेशियस काल में भूगर्भिक हलचलों के कारण अन्तर्भेदी आग्नेय लावा के उद्भेदन से दक्कन ट्रैप या दक्कन पठार का निर्माण हुआ।
इस पठार का विस्तार मध्य प्रदेश (मालवा पठार तथा दक्षिणी भागों में), गुजरात, तेलंगाना, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक तथा केरल आदि राज्यों में हुआ है।

राज्य में आर्कियन, धारवाड़, विंध्यन तथा गोंडवाना क्रम की चट्टानों के निक्षेप पाये जाते हैं जिनमें से आर्कियन, विंध्यन तथा दक्कन ट्रैप चट्टानों का विस्तार सबसे अधिक हुआ है।


मध्य प्रदेश की भूगर्भिक संरचना में आर्कियन काल (Archean Period) से लेकर क्वार्टनरी युग (Quaternary Era) तक की चट्टानें पायी जाती हैं।
भूगर्भिक संरचना की दृष्टि से मध्य प्रदेश की धरातलीय चट्टानों को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया गया है-

मध्य प्रदेश की भूगर्भिक संरचना
  • आर्कियन समूह की चट्टानें
  • धारवाड़ क्रम की चट्टानें
  • कुडप्पा क्रम की चट्टानें
  • विंध्यन क्रम की चट्टानें 
  • गोंडवाना क्रम की चट्टानें
  • दक्कन ट्रैप
  • क्वार्टनरी क्रम की चट्टानें 

आर्कियन समूह (Archean System)

आर्कियन का शाब्दिक अर्थ है, सर्वाधिक प्राचीन। इस समूह की चट्टाने प्रायद्वीपीय भारत के दो तिहाई भाग में राजस्थान से कन्याकुमारी तक विस्तृत हैं। मध्य प्रदेश के उत्तर व उत्तर-पश्चिम तथा पूर्वी भाग में आर्कियन चट्टानों का विस्तार अधिक है। इन चट्टानों में मुख्यतः ग्रेनाइट, चार्नोकाइट (Charnockite) शिस्ट तथा नीस (Gneiss) आदि खनिज पाये जाते हैं।

आर्कियन चट्टानों का निर्माण

द्रवित पदार्थ के शीतलन और दृढ़ीकरण या घनीभवन (Solidification) से।

आद्य सागरों में संगृहित प्रथम अवसादी शिलाओं के रूप में, इनका तापीय तथा प्रादेशिक रूपान्तरण हुआ है।

मैग्मा अथवा लावा के अंतर्भेद (Intrusive) या उद्भेदन के पश्चात् रूपान्तरण के फलस्वरूप शिस्ट एवं नीस जैसी चट्टानों का निर्माण हुआ है।


  • आर्कियन चट्टानों का रूपान्तरण इतना अधिक हुआ है कि, इनकी मूल विशेषताएँ लगभग समाप्त हो चुकी हैं। ये चट्टानें जीवहीन (Azoic) एवं जीवाश्म रहित होती हैं, इससे प्रमाणित होता है कि, इनके विकास के समय पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व नहीं था। ये आर्कियन चट्टानें अत्यधिक आकुंचित हैं, क्योंकि ये भ्रंशित एवं शल्कित (Foliated) अवस्था में हैं। इनमें मुख्य रूप से नीस, शिस्ट, ग्रेनाइट, फाइलाइट, खोन्डेलाइट, पेग्मेटाइट, संगमरमर तथा क्वार्ट्जाइट आदि खनिजों के निक्षेप पाये जाते हैं।
  • रूपान्तरण के कारण ग्रेनाइट, नीस में परिवर्तित हो जाता है जिसे बंगाल गुम्बद अथवा गुम्बद नाइस (Dome Gneiss) कहते हैं। इसकी संरचना शल्कित (Foliated) तथा पट्टी के रूप में पायी जाती है। इसलिए इन्हें पैतृक चट्टानें अथवा प्राथमिक चट्टानें (Primary Rocks) भी कहते हैं।

प्रायद्वीपीय नीस

प्रायद्वीपीय नीस एक प्रमुख आर्कियन चट्टान है, इनके कणों के आधार पर इसे बुन्देलखण्ड नीस तथा चार्नोकाइट नीस आदि नामों से भी जाना जाता है।

बुन्देलखण्ड नीस : यह आर्कियन क्रम की चट्टान से निर्मित है, जिसके कणों का आकार वृहत् (Macro) होता है। यह ग्रेनाइट के समान दिखाई पड़ती है। इसका विस्तार मध्य प्रदेश के अतिरिक्त महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में हुआ है।

चार्नोकाइट नीस : इन चट्टानों के कणों का आकार सूक्ष्म (Micro) होता है। इन चट्टानों को नीलगिरी नीस भी कहते हैं, क्योंकि इसका रंग गहरा नीला से भूरा होता है। इसका नामकरण कोलकाता के संस्थापक जॉब चार्नोक के नाम पर किया गया है। चार्नोकाइट नीस का विस्तार मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा झारखण्ड आदि राज्यों में हुआ है।


आर्कियन समूह की चट्टानें खनिज सम्पदा की दृष्टि से भारत की सबसे समृद्ध चट्टानें हैं। इनमें धात्विक, अधात्विक खनिजों के अतिरिक्त दुर्लभ खनिज (Rare Mineral), बहुमूल्य रत्न, ताँबा, मैंगनीज, लोहा तथा अभ्रक आदि के निक्षेप पाये जाते हैं।

धारवाड़ चट्टान (Dharwar Rock)

  • धारवाड़ क्रम की चट्टानों का निर्माण आर्कियन नीस और शिस्ट शैलों के अनाच्छादन (Denudation) और अपरदन (Erosion) से प्राप्त अवसादों (Sediments) के निक्षेप (Deposit) से हुआ है।
  • सर्वप्रथम इन चट्टानों की खोज कर्नाटक के धारवाड़ जिले में की गई थी। ब्रुसफूट (Bruce Foote) द्वारा इन चट्टानों का नाम धारवाड़ (Dharwar) रखा गया है।
  • धारवाड़ क्रम की चट्टानों में स्लेट, शिस्ट, नीस, ग्रेनाइट, फाइलाइट एवं क्वार्ट्जाइट आदि खनिजों की प्रधानता होती है।
  • ये चट्टानें जीवाश्म रहित होती हैं, परन्तु इनका आर्थिक महत्व अधिक होता है, क्योंकि इसमें कोबाल्ट, मैंगनीज, अभ्रक, क्रोमियम आदि के निक्षेप पाए जाते हैं।
  • मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्व में धारवाड़ क्रम की चट्टानों का विस्तार 3 समूहों में पाया जाता है-

धारवाड़ क्रम की चट्टानें
  • चिल्पी क्रम
  • सकोली क्रम
  • सौसर क्रम

चिल्पी क्रम (Chilpi Series)
चिल्पी क्रम की चट्टानों का विस्तार मध्य प्रदेश के बालाघाट जबलपुर तथा छिंदवाड़ा जिलों में पाया जाता है। इन चट्टानों में फाइलाइट, क्वार्ट्जाइट, ग्रीन स्टोन तथा मैंगनीज आदि के निक्षेप पाये जाते हैं।

क्लोजपेट क्रम (Closepet Series)

इन चट्टानों का विस्तार मध्य प्रदेश के बालाघाट तथा छिंदवाड़ा जिलों में पाया जाता है।

क्लोजपेट क्रम की चट्टानों में क्वार्ट्जाइट मैंगनीज तथा कॉपर के पायराइट पाये जाते हैं।

बालाघाट जिले में स्थित मलाजखण्ड (Malajkhand) में ताँबे के वृहद भण्डार पाये जाते हैं।


सकोली क्रम (Sakoli Series)
सकोली क्रम की चट्टानों का विस्तार राज्य के जबलपुर जिले में पाया जाता है। इसमें अभ्रक, शिस्ट, डोलोमाइट तथा संगमरमर आदि के निक्षेप पाये जाते हैं। यहाँ से सर्वोच्च गुणवत्ता का संगमरमर प्राप्त है।

सौसर क्रम (Sausar Series)
इसका विस्तार महाराष्ट्र के नागपुर से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले तक एक पट्टी के रूप में पाया जाता है। इसमें अभ्रक, शिस्ट, संगमरमर, क्वार्ट्जाइट तथा मैंगनीज की अधिकता पायी जाती है।

कुडप्पा क्रम की चट्टानें

  • इसका निर्माण भी प्री-कैम्ब्रियन युग (Pre-Cambarian Era) में आर्कियन चट्टानों के अनाच्छादन और अपरदन से प्राप्त अवसादों के निक्षेप से हुआ है। ये प्राचीन अवसादी चट्टानें हैं।
  • भूगर्भिक हलचलों के कारण दरार और भ्रंश आदि का निर्माण हुआ। इन्हीं दरारों एवं भ्रंशों में प्री-कैम्ब्रियन से लेकर इयोसीन काल तक अवसादी चट्टानों का निक्षेप हुआ।
  • कुडप्पा चट्टानों के अत्यधिक रूपान्तरण के फलस्वरूप इनमें विभिन्न प्रकार के खनिज जैसे- शेल, क्वार्ट्जाइट, स्लेट, चूना पत्थर और बलुआ पत्थर आदि के निक्षेप पाये जाते हैं। बलुआ पत्थर के रूपान्तरण से क्वार्ट्जाइट का निर्माण हुआ है।

कुडप्पा क्रम की चट्टानें क्षैतिज अवस्था में पायी जाती हैं। इनकी मोटाई लगभग 6,000 मी. तक होती है।


  • कुडप्पा क्रम की चट्टानों का विस्तार आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान आदि राज्यों में हुआ है। इनका नामकरण आन्ध्र प्रदेश के कुडप्पा जिले के आधार पर किया गया है। निर्माण की दृष्टि से इन्हें दो वर्गों में विभाजित किया गया है- निचली कुडप्पा क्रम की चट्टानें तथा ऊपरी कुडप्पा क्रम की चट्टानें।
  • ऊपरी कुडप्पा क्रम की चट्टानों में चूना पत्थर एवं शेल की अधिकता होती है, जिससे ये शिलाएँ विंध्यन क्रम की शिलाओं के समान प्रतीत होती हैं।
  • निचली कुडप्पा क्रम की चट्टानों का विस्तार मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं ओडिशा आदि राज्यों में हुआ है। इन चट्टानों में रंगीन शिस्ट, जास्पर तथा लौह व मैंगनीज धातुएँ पायी जाती हैं।
  • सर्वाधिक खनिज पाये जाने के कारण इन्हें समृद्ध चट्टाने भी कहते हैं।
  • कुडप्पा क्रम की चट्टानें जीवाश्म रहित एवं जीव विहीन होती हैं। लोहा, मैंगनीज, ताँबा, निकेल तथा कोबाल्ट आदि खनिज पदार्थों की उपस्थिति के कारण कुडप्पा चट्टानें आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
मध्य प्रदेश में कुडप्पा क्रम की चट्टानों के दो उपक्रम पाये जाते हैं-

कुडप्पा क्रम की चट्टानें
  • बिजावर उपक्रम
  • ग्वालियर उपक्रम

बिजावर उपक्रम
बिजावर उपक्रम की चट्टानों का विस्तार मध्य प्रदेश के पन्ना और छतरपुर जिलों में है। इन चट्टानों के आधार में बलुआ पत्थर एवं क्वार्ट्जाइट चट्टानों का निक्षेपण है तथा इनके ऊपर चूना पत्थर का जमाव पाया जाता है। इन चट्टानों की परतों के मध्य में बेसाल्ट चट्टानें पायी जाती हैं, जिनमें हीरे के निक्षेप पाये जाते हैं।

ग्वालियर उपक्रम
ग्वालियर उपक्रम की चट्टानें ग्वालियर के निकट पायी जाती हैं। इनमें बलुआ पत्थर, शेल, क्वार्ट्जाइट, चूना पत्थर और बेसाल्ट लावा की चट्टानों के निक्षेप पाये जाते हैं। इस उपक्रम की ऊपरी चट्टानों को मोरार (Morar) तथा निचली चट्टानों को पार (Par) कहते हैं।

विंध्यन क्रम की चट्टानें

  • विंध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण भी प्री-कैम्ब्रियन युग (Precambrian Era) में हुआ है। इन चट्टानों का विस्तार मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड राज्यों में हुआ है। विंध्यन क्रम की चट्टानें पश्चिम से पूर्व लगभग 1050 किमी. लम्बाई में लगभग 1,03,600 वर्ग किमी. क्षेत्रफल में विस्तृत हैं।
  • मध्य प्रदेश में विंध्यन क्रम की चट्टानों का सर्वाधिक विस्तार नर्मदा के उत्तर में पाया जाता है, जो राज्य के दमोह जिले में अवस्थित हैं। विंध्यन पर्वत श्रृंखला उत्तर के मैदानी तथा प्रायद्वीपीय भागों के मध्य विभाजक का कार्य करती है जिसकी सबसे ऊँची चोटी सद्भावना शिखर (752 मीटर) है।
  • विंध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण एक लम्बे कालक्रम में हुआ है, इसीलिए इनकी ऊपरी और निचले क्रम की चट्टानों में स्पष्ट अंतर दिखाई पड़ता है। इसमें चूना पत्थर, शेल तथा बलुआ पत्थर आदि के निक्षेप पाये जाते हैं।
  • विंध्यन क्रम की चट्टानों की मोटाई लगभग 4200 मी. तक होती है। इसका नामकरण विंध्य (Vindhya) पर्वत श्रृंखला के नाम पर विंध्यन रखा गया है।
  • विंध्यन क्रम की चट्टानों की संरचना में सूक्ष्म कणों से लेकर बड़े आकार तक के बलुआ पत्थर, शेल तथा चूना पत्थर आदि के निक्षेप पाए जाते हैं। अरावली और विंध्यन पर्वत श्रृंखला के मध्य 800 किमी. लम्बा ग्रेट बाउंड्री भ्रंश (Great Boundary Fault) स्थित है, जो इन दोनों पर्वत श्रृंखलाओं को पृथक करता है।
  • इन चट्टानों में सजावटी पत्थर, बहुमूल्य रत्न, चूना पत्थर, शीशा, गृह निर्माण सामग्री, सीमेन्ट तथा रसायन उद्योग हेतु कच्चे माल की प्राप्ति होती है। पन्ना एवं गोलकुंडा की प्रसिद्ध खदाने कांग्लोमरेट से सम्बंधित हैं।
  • विंध्यन क्रम के पत्थरों का रंग लाल होता है, जिनसे अनेक ऐतिहासिक भवनों का निर्माण हुआ।

सासाराम में स्थित शेरशाह सूरी का मकबरा, सारनाथ, साँची एवं भरहुत का स्तूप, जामा मस्जिद, ग्वालियर का किला तथा लाल किला आदि का निर्माण इन्हीं लाल पत्थरों से हुआ है।


विंध्यन क्रम की चट्टानें सामान्यतः जीवाश्म विहीन होती हैं, किन्तु कैमूर क्रम की चट्टानों के निचले भागों में कार्बनिक पदार्थों की उपस्थिति से वानस्पतिक जीवन के कुछ संकेत मिलते हैं।
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निचला विंध्यन क्रम 

सेमरी उपक्रम (Semri Series)
  • यह निचले विंध्यन क्रम की चट्टानों का एक उपक्रम है, जिसका अधिकांश विस्तार मध्य प्रदेश के उत्तर-पूर्व में सोन नदी की घाटी में हुआ है। इस क्षेत्र में बलुआ पत्थर, चूना पत्थर तथा शेल आदि के निक्षेप पाये जाते हैं। कच्चे माल की उपलब्धता के कारण इस क्षेत्र में सीमेन्ट उद्योग का विकास हुआ है।
  • निचले विंध्यन में वलय (Folds) और भ्रंश (Faults) अधिक पाये जाते हैं। दमोह और सागर जिलों के दक्षिण में विस्तृत क्षेत्रों में गुम्बदाकार उच्च भूमियाँ एवं घाटियाँ पायी जाती हैं।

ऊपरी विंध्यन क्रम (Upper Vindhyan System)

  • इसका विकास निचले विंध्यन क्रम की चट्टानों के बाद हुआ है। ऊपरी विंध्यन क्रम की चट्टानों का निर्माण ज्वारनदमुख तथा नदियों की घाटियों में हुआ है। इसमें बलुआ पत्थर, शेल तथा कांग्लोमरेट चट्टानों की परतें पायी जाती हैं।
इसको तीन उपक्रमों में विभाजित किया है-

कैमूर उपक्रम (Kaimur Series)
  • इस उपक्रम का विस्तार मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश तथा बिहार राज्यों में हुआ है। इसका सबसे अधिक विकास बुन्देलखण्ड और बघेलखण्ड के क्षेत्रों में हुआ है। इसमें मुख्य रूप से बलुआ पत्थर, शेल तथा कांग्लोमरेट चट्टानें पायी जाती हैं।
  • राज्य में कैमूर उपक्रम का विस्तार पन्ना, सतना तथा रीवा जिलों में हुआ है। पन्ना जिले के पूर्वी भाग (बुन्देलखण्ड) में ग्रेनाइट चट्टानें पाई जाती हैं। पुलकोवा पहाड़ी के निकट स्थित केन एवं अन्य नदियों ने कगारों का निर्माण किया है। इन कगारों से कांग्लोमरेट चट्टानें दिखाई पड़ती हैं। इनमें शेल और क्वार्ट्जाइट के निक्षेप पाये जाते हैं, जिनका उपयोग गृह निर्माण में किया जाता है।

रीवा उपक्रम (Rewa Series)
  • इसका विस्तार कैमूर उपक्रम के उत्तर-पश्चिम में सागर, पन्ना तथा दमोह आदि जिलों में पाया जाता है। इस उपक्रम के मध्य से प्रयागराज (इलाहाबाद) से कटनी (मध्य प्रदेश) के मध्य रेल लाइन गुजरती है। इसमें उपस्थित बलुआ पत्थर की दो अवस्थाएँ पायी जाती हैं, इसके निचले शेल को पन्ना शेल तथा ऊपरी शेल को झिरि शेल (राजगढ़ जिला) कहते हैं। पन्ना क्षेत्र से हीरा प्राप्त किया जाता है।
  • इसके कण मध्यम से बड़े आकार के होते हैं एवं इनका रंग गुलाबी व बैंगनी होता है। बड़े आकार में कणों की उपस्थिति के कारण यह अनुमान लगाया जाता है कि, रीवा उपक्रम के निर्माण के समय जलवायु शुष्क रही होगी। इसमें बलुआ पत्थर, चूना पत्थर, शेल आदि के निक्षेप पाये जाते हैं जिनका उपयोग सीमेन्ट और शीशा उद्योग में किया जाता है।

भाण्डेर उपक्रम (Bhander Series)
  • भाण्डेर उपक्रम का विस्तार विंध्यन श्रेणी के पश्चिम में सतना, सागर तथा दमोह जिलों के पठारी भागों में पाया जाता है। इस उपक्रम की दो अवस्थाएँ हैं- गानौरगढ़ शेल (Ganurgarh Shale) तथा सिरबू शेल (Sirbu Shale)।
  • इस उपक्रम की चट्टनों में चूना पत्थर, बलुआ पत्थर तथा शेल के निक्षेप पाये जाते हैं। इस क्षेत्र में सूक्ष्म से मध्यम आकार के कण गुलाबी व बैंगनी पत्थरों के निक्षेप पाये जाते हैं जिनका उपयोग गृह निर्माण और सीमेन्ट उद्योग में किया जाता है।
  • विंध्यन क्रम की चट्टानों में दरार और भ्रंश अधिक पाये जाते हैं। इन्हीं भ्रंशों तथा दरारों में आर्कियन चट्टानों के अवसादों के निक्षेप से इन चट्टानों का निर्माण हुआ है। इनके संस्तर क्षैतिज अवस्था में पाये जाते हैं।

गोंडवाना क्रम की चट्टानें

गोंडवाना क्रम की चट्टानें परतदार अवसादी चट्टानें हैं। इनका निर्माण मध्य कार्बोनीफेरस काल से जुरैसिक काल के अन्तिम चरण तक द्रोणी बेसिनों में अवसादों तथा चट्टानों के वृहद निक्षेपण से हुआ है।
भूगर्भिक हलचलों के कारण इस क्षेत्र के सघन वन मलबे के रूप में नीचे दब गये, जिनके अवसादीकरण के कारण कोयले का निर्माण हुआ।

इन चट्टानों का अध्ययन सर्वप्रथम मध्य प्रदेश (दक्षिण-पूर्व) के प्राचीन गोंड राज्य में किया गया था। इसी आधार पर इन चट्टानों का नाम गोंडवाना (Gondwana) रखा गया।


मध्य प्रदेश राज्य में गोंडवाना क्रम की चट्टानों में निम्न उपक्रम अथवा अवस्थाएँ पायी जाती हैं-
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निचला गोंडवाना क्रम

तलचर उपक्रम (Talcher Series)
  • इसका नामकरण ओडिशा के अंगुल जिले में स्थित तलचर के नाम पर किया गया है। यहाँ कोयले के वृहद भण्डार हैं, जो ब्राह्मणी नदी घाटी क्षेत्र में स्थित हैं। इस उपक्रम के कोयले का विस्तार मध्य प्रदेश के पूर्वी क्षेत्रों में स्थित सिंगरौली, सीधी तथा शहडोल आदि जिलों में पाया जाता है। ये शैलें जीवाश्मयुक्त होती हैं।

ऊपरी गोंडवाना क्रम

महादेव उपक्रम (Mahadev Series)
महादेव उपक्रम को पचमढ़ी उपक्रम के नाम से भी जाना जाता है। पचमढ़ी, सतपुड़ा श्रेणी में स्थित है। महादेव उपक्रम में कोयले के भण्डार उपस्थित हैं, जिनका विस्तार छिंदवाडा, नरसिंहपुर तथा सिवनी आदि जिलों में पाया जाता है। इसे दो अवस्थाओं में विभाजित किया गया है- पचमढ़ी तथा मलेरी।

दक्कन ट्रैप (Deccan Traps)

ट्रैप का शाब्दिक अर्थ है, सोपान या कदम (नीचे धँसा हुआ भाग)। दक्कन ट्रैप का निर्माण क्रिटेशियस काल में भू-गर्भिक हलचलों के कारण ज्वालामुखी क्रियाओं से हुआ है, जिसके दरारी उद्भेदन से दक्कन क्षेत्र में लावा का निक्षेप हुआ है। इसके लावा में सल्फर की मात्रा अधिक थी. इसलिए इसका क्रिस्टलीकरण (रवा बनने की प्रक्रिया) अधिक तेजी से हुआ।

बेसाल्ट लावा का निक्षेप पठार के मध्यवर्ती (महाराष्ट्र) क्षेत्रों में अधिक हुआ है। यहाँ लावा की मोटाई 50 मी. से 3000 मी. तक पाई जाती है एवं इसका क्षेत्रफल लगभग 5 लाख वर्ग किमी. है। इसका विस्तार गुजरात, महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश आदि राज्यों तक पाया जाता है।

यह एक आग्नेय चट्टान (Igneous Rock) है, जिसके विघटन और वियोजन कायांतरण और अवसादीकरण के फलस्वरूप पठारी क्षेत्र के ऊपरी संस्तर में काली, गहरी भूरी या लाल रेगर (Regur Soil: काली कपास) मृदा का विकास हुआ है। दक्कन ट्रैप की सर्वाधिक ऊँचाई मुम्बई में है। पश्चिम से पूर्व की ओर इसकी ऊँचाई घटती जाती है। दक्कन ट्रैप को 3 भागों में विभाजित किया गया है-

1. निचला ट्रैप: इसका विस्तार मध्य प्रदेश में नर्मदा घाटी के क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी ऊँचाई लगभग 150 मी. है। निचले दक्कन ट्रैप के कणों की संरचना सूक्ष्म है तथा इसकी परतों के मध्य राख एवं जीवाश्म के कण पाये जाते हैं। यहीं पर बाघ एवं लमेटा नामक दो पृथक संरचना वाले संस्तर स्थित हैं, जिनका निर्माण उत्तर क्रिटैशियसकाल में हुआ है। इनमें चूना पत्थर की परतें पायी जाती हैं, जिनके कणों का आकार अपेक्षाकृत बड़ा होता है।

2. मध्यवर्ती ट्रैप: इसका विस्तार मालवा एवं मध्य भारत के क्षेत्रों में हुआ है। इसकी ऊँचाई लगभग 1200 मी. है। इसमें जीवाश्म नहीं पाये जाते हैं।

3. ऊपरी ट्रैप: इसका विस्तार महाराष्ट्र गुजरात तथा मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में हुआ है। इसमें जीवाश्म के लक्षण पाये जाते हैं, क्योंकि इनकी परतों के मध्य राख की अनेक परतें पायी जाती हैं। मध्य प्रदेश में इसका विस्तार मालवा पठार के अतिरिक्त दक्षिण-पश्चिम व दक्षिण-पूर्व के क्षेत्रों में हुआ है।


जबलपुर उपक्रम (Jabalpur Series)
  • इस उपक्रम का विकास मध्य प्रदेश के कटनी तथा जबलपुर के क्षेत्रों में हुआ है। इसकी दो अवस्थाएँ पायी जाती हैं- निचला चौगान तथा ऊपरी जबलपुर। इस उपक्रम में जुरैसिक काल की वनस्पतियों के अवशेष पाये जाते हैं। इस क्षेत्र में लिग्नाइट कोयले के साथ-साथ कांग्लोमरेट, चूना पत्थर, बलुआ पत्थर तथा शेल आदि के निक्षेप भी पाये जाते हैं।

क्वार्टनरी क्रम की चट्टानें

  • क्वार्टनरी चट्टानों का निर्माण प्लीस्टोसीन तथा होलोसीन काल में नदियों द्वारा लाये गये अवसादों (Sediments) के निक्षेप से हुआ है, इसलिए इसे नवीन जलोढ़ भी कहते हैं। मध्य प्रदेश में इसका विस्तार ताप्ती नर्मदा तथा चम्बल आदि नदी घाटियों के क्षेत्रों में हुआ है।

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।