गढ़ा का गोंड वंश (मध्य प्रदेश)

गढ़ा का गोंड वंश: मध्य प्रदेश

गढ़ा का गोंड वंश मध्य प्रदेश के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 15वीं सदी में स्थापित इस राज्य का शासन संग्रामशाह, रानी दुर्गावती और अन्य गोंड शासकों ने किया। 1781 ई. में मराठों के आधिपत्य के साथ इसका अंत हुआ। यह लेख गढ़ा राज्य के उत्थान और पतन की विस्तृत जानकारी देता है।
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15वीं सदी के प्रारंभ में मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भाग में विंध्याचल और सतपुड़ा पहाड़ियों के मध्य एक समृद्ध गोंड राज्य स्थित था। यह राज्य गढ़ा, गढ़ कटंगा और गढ़-मंडला आदि नामों से प्रसिद्ध था। गोंड राजाओं की इस सत्ता का उल्लेख विभिन्न ऐतिहासिक शिलालेखों में मिलता है।

गढ़ा राज्य के प्रारंभिक शासक

रामनगर के संस्कृत शिलालेख में यादवराय से लेकर हृदयशाह तक कुल 54 शासकों का उल्लेख किया गया है। यह शिलालेख 1667 ई. में गढ़ा के शासक हृदयशाह के शासनकाल में उत्कीर्ण किया गया था।

संग्रामशाह और गढ़ा राज्य का उत्कर्ष

गढ़ा राज्य के महानतम शासकों में संग्रामशाह का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनके सिक्कों पर उन्हें पुलत्स्यवंशी कहा गया है। 1510-1513 ई. के मध्य उन्होंने सिंहासन ग्रहण किया और 1516 ई. में ‘संग्रामशाह’ की उपाधि धारण की। रामनगर शिलालेख और ‘गढ़ेशनृपवर्णनम्’ शिलालेख के अनुसार संग्रामशाह के अधीन 52 गढ़ थे। उनकी मृत्यु के पश्चात् 1543 ई. में उनका ज्येष्ठ पुत्र दलपतशाह सिंहासन पर बैठा।

रानी दुर्गावती का वीरतापूर्ण शासन

दलपतशाह की 1550 ई. में आकस्मिक मृत्यु के पश्चात् उनकी विधवा रानी दुर्गावती ने गढ़ा राज्य की बागडोर अपने हाथ में ले ली। उन्होंने अधार कायस्थ और मान ब्राह्मण नामक दो महत्वपूर्ण अधिकारियों की सहायता से अपने नवजात पुत्र वीरनारायण को राजसिंहासन पर बैठाया।
हालांकि, मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में मानिकपुर के सूबेदार आसफ खाँ ने गढ़ा राज्य पर आक्रमण कर दिया। रानी दुर्गावती ने अपने स्वाभिमान की रक्षा हेतु आत्महत्या कर ली। इसके पश्चात् अकबर ने गढ़ा राज्य को अपनी सल्तनत में सम्मिलित कर लिया।

गढ़ा राज्य पर मुगल और मराठा प्रभाव

दलपतशाह के भाई चन्द्रशाह को बादशाह अकबर से अनुमति लेकर निम्नलिखित दस गढ़ों पर 1576 ई. तक शासन करने का अधिकार प्राप्त हुआ:
  • रायसेन
  • कारूबाग
  • कुरवाई
  • भोपाल
  • भौरासो
  • गढ़गुनौर
  • बारीगढ़
  • चौकीगढ़
  • राहतगढ़
  • मकड़ाई
इसके बाद उसका छोटा पुत्र मधुकर शाह सिंहासन पर बैठा। इसके शासनकाल में निर्मित पीतल के चौकोर सिक्के प्राप्त हुए हैं। संवत् 1664 के सिक्कों में एक ओर देवनागरी लिपि में श्री कृष्ण श्री मधुकरशाह और दूसरी ओर देवनागरी लिपि में ही गढ़ागढ़, संवत् 1664 और फारसी लिपि में मधुकरशाह अंकित है।
1731 ई. में मधुकरशाह की मृत्यु के बाद शिवराजशाह शासक बने। 1742 ई. में पेशवा ने गढ़ा पर आक्रमण कर मंडला के किले पर अधिकार कर लिया। 1749 ई. में शिवराजशाह की मृत्यु के पश्चात् दुर्गशाह सत्तारूढ़ हुए, लेकिन उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद निजामशाह ने गढ़ा राज्य की सत्ता संभाली और संस्कृत कवि लक्ष्मी प्रसाद दीक्षित को संरक्षण प्रदान किया।

गढ़ा राज्य का अंत

गढ़ा राज्य के अंतिम गोंड शासक नरहरिशाह थे। 1781 ई. में सम्पूर्ण गढ़-मंडला पर मराठों ने आधिपत्य स्थापित कर लिया और गोंड वंश का पतन हो गया।
गढ़ा का गोंड वंश मध्य प्रदेश के गौरवशाली इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। इस राज्य ने अपने समय में समृद्धि और शक्ति की अनूठी मिसाल पेश की थी। संग्रामशाह, रानी दुर्गावती और अन्य शासकों की वीरता आज भी इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।