मालवा का परमार वंश (मध्य प्रदेश)

मालवा का परमार वंश (मध्य प्रदेश)

मालवा का परमार वंश भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण राजवंश था, जिसने मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र पर शासन किया। प्रारंभ में, परमार शासक राष्ट्रकूटों के सामंत थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
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इस लेख में, हम परमार वंश के उत्थान, प्रमुख शासकों, उनकी उपलब्धियों और अंततः उनके पतन का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
  • मालवा के परमार शासक प्रारंभ में राष्ट्रकूटों के सामंत थे। 812 ई. के आस-पास राष्ट्रकूट नरेश गोविन्द तृतीय ने प्रतिहार नरेश नागभट्ट द्वितीय से मालवा को जीतकर अपने सामंत उपेन्द्र या कृष्ण राज को सिंहासन पर बैठाया। कृष्ण राज परमार राजवंश का संस्थापक था। यद्यपि प्रतिहारों द्वारा मालवा को पुनः जीत लिए जाने के पश्चात् मालवा पर इस वंश का अधिकार समाप्त हो गया और 946 ई. तक यह प्रतिहारों के आधिपत्य में बना रहा।
  • इसके पश्चात् परमार वंश के बैरीसिंह द्वितीय ने राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण तृतीय से सहायता प्राप्त कर मालवा क्षेत्र को पुनः अधिकार में ले लिया। उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार, उसने अपनी तलवार के बल पर यह सिद्ध कर दिया कि धारा (धार) उसी की है। बैरीसिंह द्वितीय के शासनकाल में परमारों ने अपनी राजधानी मूल स्थान उज्जैन से धार स्थानांतरित कर दी।
  • उसके पुत्र सियक द्वितीय ने 972 ई. में अपने अधिपति राष्ट्रकूट नरेश खोत्तिग को परास्त कर मालवा में स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, जिसकी सीमाएँ उत्तर में झालावाड़, दक्षिण में ताप्ती, पूर्व में भेलसा तथा पश्चिम में साबरमती तक विस्तृत थीं।
  • सियक द्वितीय द्वारा राज्य त्याग के पश्चात् उसका पुत्र वाक्पति मुंज (लगभग 973-998 ई.) शासक बना। मुंज एक महान योद्धा, विद्वान एवं सुयोग्य प्रशासक था। उसके समय मालवा में स्वर्णयुग का आरंभ हुआ। उसने धार में मुंज सागर झील का निर्माण करवाया। मुंज के द्वारा महेश्वर, उज्जैन, ओंकारेश्वर और धरमपुरी में भी सुंदर मंदिरों का निर्माण करवाया गया।
  • उसने कलचुरि, हूण और चालुक्य शासकों से युद्ध में विजय प्राप्त की। उसका मुख्य संघर्ष चालुक्य नरेश तैलप द्वितीय से हुआ था। मुंज ने उसे 6 बार परास्त किया, किन्तु सातवें आक्रमण में अपने अमात्य रुद्रोदित्य का परामर्श न मानते हुए गोदावरी नदी को पार कर गया। जहाँ तैलप द्वितीय ने उसे बंदी बना लिया तथा कुछ समय पश्चात् उसे मृत्युदण्ड दे दिया गया।
  • मुंज के पश्चात् उसका भाई सिंधुराज शासक बना। उसने दक्षिण के चालुक्य नरेश सत्याश्रय को परास्त कर अपने भाई मुंज द्वारा खोए गए भू-भाग पर पुनः अधिकार कर लिया। इसकी अन्य विजयों और उपलब्धियों का वर्णन पद्मगुप्त ने अपने काव्य नवसाहसांक चरित में किया है। नवसाहसांक चरित में सिंधुराज द्वारा धार में शिवलिंग की स्थापना किए जाने का उल्लेख है। सिंधुराज अन्हिलवाड़ के चालुक्य नरेश चामुण्डराय के साथ युद्ध में सहयोगी था।
  • सिंधुराज के पश्चात् उसका पुत्र भोज (लगभग 1000 से 1055 ई.) मालवा के सिंहासन पर बैठा। राजा भोज एक महान योद्धा के साथ-साथ महान विद्वान भी था। भोपाल (भोजपाल) शहर का नाम राजा भोज के नाम पर पड़ा है। राजा भोज ने भोपाल के निकट ग्राम भोजपुर नामक ग्राम की स्थापना की और एक शिव मंदिर का निर्माण करवाया था। राजाभोज द्वारा भोजपुर में एक विशाल बाँध (साइक्लोपियन) का निर्माण करवाया गया। इस विद्वान राजा ने विभिन्न विषयों पर 23 ग्रंथों की रचना की।
  • आइन-ए-अकबरी के अनुसार, राजाभोज की राजसभा में 500 विद्वान थे, जिनमें से धनपाल, उवत आदि प्रमुख थे। उसने धार में संस्कृत के पठन-पाठन के लिए एक विद्यालय की स्थापना की थी, जिसे भोजशाला कहा जाता है तथा यहीं पर सरस्वती मंदिर का निर्माण भी करवाया था।
  • 1020 ई. में भोज ने शिलाहार काशीदेव को पराजित कर कोंकण पर विजय प्राप्त कर ली और कुछ समय तक इसे अपने अधीन रखा। उसने उड़ीसा में महानदी के तट पर स्थित आदिनगर के शासक इन्द्ररथ को परास्त किया था। भोज ने दक्षिण गुजरात के शासक कीर्तिराज से युद्ध किया था। भोज ने 1008 ई. में हिन्दूशाही आनंदपाल को महमूद गजनवी के विरुद्ध सहायता प्रदान की थी और उसके पुत्र त्रिलोचनपाल को 1019 ई. में अपने राज्य में आश्रय दिया था। राजाभोज ने त्रिपुरी के कलचुरि नरेश गांगेयदेव को परास्त किया था।
  • 1047 ई. के लगभग कल्याणी के चालुक्य सोमेश्वर प्रथम ने राजा भोज को परास्त कर धार नगरी को लूट लिया था। उसके जीवन के अंतिम दिनों में चालुक्य शासक भीम तथा त्रिपुरी के कलचुरि राजा लक्ष्मीकर्ण ने संयुक्त रूप से मालवा पर 1055 ई. में आक्रमण किया, जिसमें राजा भोज की मृत्यु हो गयी।
  • राजा भोज के पश्चात् मालवा पर कलचुरि नरेश लक्ष्मीकर्ण तथा चालुक्य नरेश भीम का अधिकार हो गया था। किन्तु भोज के पुत्र जयसिंह प्रथम ने दक्षिण के चालुक्य युवराज विक्रमादित्य की सहायता से मालवा से कलचुरियों और चालुक्यों को पराजित किया, परन्तु शीघ्र ही त्रिपुरी के कलचुरि राजा लक्ष्मीकर्ण ने चालुक्य शासक सोमेश्वर के साथ मिलकर जयसिंह पर आक्रमण कर युद्ध में उसका वध कर दिया। उसके बाद इस वंश के अगले शासक उदयादित्य ने चौहान शासक विग्रह राज तृतीय की सहायता से मालवा पर पुनः अधिकार कर लिया। उदयादित्य की रानी शालमाली ने भोपाल में एक मन्दिर (सभामण्डल) का निर्माण करवाया, वर्तमान में इस स्थान पर कुदसिया बेगम द्वारा निर्मित मस्जिद स्थित है।
  • उदयादित्य के पश्चात् लक्ष्यदेव (इंगददेव), नरवर्मन तथा यशोवर्मन क्रमशः सत्तासीन हुए। यशोवर्मन के शासनकाल में मालवा के 'कुछ भाग पर चालुक्यों, चंदेलों और चौहानों ने अधिकार कर लिया था।
  • गुजरात के चालुक्य जयसिंह सिद्धराज ने संपूर्ण मालवा पर अधिकार कर अवंतिनाथ की उपाधि धारण की। 1138 ई. तक मालवा जयसिंह के आधिपत्य में रहा। इसके बाद जयवर्द्धन इस वंश का उत्तराधिकारी हुआ। उसने होयसल और यादव राजाओं से युद्ध किए तथा मालवा की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया।
जयसिंह के उत्तराधिकारी सुभट वर्मा और अर्जुन वर्मा को चालुक्यों और यादव शासकों से युद्ध में संलग्न रहना पड़ा। अर्जुन वर्मा के पश्चात् देवपाल शासक बना। देवपाल के शासनकाल में इल्तुतमिश ने मालवा पर आक्रमण किया। उसने 1233 ई. में विदिशा पर अधिकार कर उज्जैन को लूटा, परंतु यह विजय स्थायी नहीं रही। देवपाल के पुत्र जयतुगी (1239-55 ई.) को 1250 ई. में बलबन के आक्रमण का सामना करना पड़ा था।
कालान्तर में गुजरात के बघेल शासक विशालदेव ने धार को नष्ट कर दिया और यादव राजा कृष्ण ने मालवा पर भीषण आक्रमण किया था। लगभग इसी समय से मालवा का विघटन प्रारम्भ हो गया।
1283 ई. के बाद रणथम्भौर के हमीर चहमान तथा जलालुद्दीन खिलजी ने परमारों के क्षेत्र में लूटमार प्रारम्भ कर दी और अन्तत: 1305 ई. परमार वंश के अंतिम शासक महलकदेव को अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति आइन-उल-मुल्क ने पराजित कर दिया तथा उसके मालवा राज्य को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास
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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।