रीवा का चावल आंदोलन (मध्य प्रदेश)

रीवा का चावल आंदोलन

मध्य प्रदेश के इतिहास में रीवा का चावल आंदोलन एक महत्वपूर्ण घटना थी, जो शोषणकारी नीतियों के विरुद्ध जनता के संघर्ष का प्रतीक बनी। यह आंदोलन 28 फरवरी, 1947 को रीवा राज्य में जबरिया लेव्ही (अनिवार्य अनाज वसूली) के विरोध में उग्र रूप से सामने आया।
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आंदोलन की पृष्ठभूमि  

ब्रिटिश शासन के समय देशी रियासतों में किसानों और आम जनता से जबरन अनाज वसूला जाता था, जिसे 'लेव्ही' कहा जाता था। रीवा राज्य में भी यह व्यवस्था लागू थी, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता था। गरीब किसानों की मेहनत से उपजे अनाज को जबरदस्ती छीन लिया जाता था, जिससे वे भुखमरी की कगार पर पहुंच गए थे। इस अन्यायपूर्ण नीति के खिलाफ रीवा की जनता में आक्रोश पनप रहा था, जिसने अंततः रीवा के चावल आंदोलन को जन्म दिया।  

मुख्य घटनाक्रम  

28 फरवरी, 1947 को रीवा राज्य में जबरिया लेव्ही के विरोध में जनता ने आंदोलन किया। इस विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए रीवा राज्य की सेना ने त्रिभुवन तिवारी (भदवार ग्राम) और भैरव प्रसाद उरमालिया (शिवराजपुर) पर गोली चला दी, जिससे उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई।  

रीवा चावल आंदोलन का प्रभाव  

इस आंदोलन ने रीवा राज्य में अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने का कार्य किया।  
  • त्रिभुवन तिवारी और भैरव प्रसाद उरमालिया की शहादत ने रीवा के लोगों को संगठित किया और स्वतंत्रता संग्राम को और मजबूती दी।  
  • यह आंदोलन ब्रिटिश शासन और देशी रियासतों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण संघर्ष के रूप में दर्ज हुआ।
रीवा का चावल आंदोलन केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह अन्याय और शोषण के खिलाफ आम जनता के साहस और बलिदान का प्रतीक बना।
यह घटना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई और किसानों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने में सहायक बनी।

2. मध्य प्रदेश का इतिहास

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Kartik Budholiya

Kartik Budholiya

प्रतियोगी परीक्षाओं के मार्गदर्शक Kartik Budholiya को मध्य प्रदेश की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्थाओं का गहन अनुभव है। वे MPPSC और अन्य राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए सटीक विश्लेषण और प्रमाणिक अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए जाने जाते हैं।